इस साल के बजट भाषण में हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी ने कहा था कि वे दो बैंकों का मुद्रीकरण करेंगे यानी कि मुद्रीकरण मतलब प्राइवेटाइजेशन करेंगे। मतलब सरकार इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को प्राइवेट करेगी या बेच देगी और पैसे कमाए गी।
यह दो बैंक थे ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया।
बैंकिंग का इतिहास इंडिया में काफी पुराना नहीं है आजादी से पहले तक अगर हमें किसी से कर्ज लेना आता था तो वह हमारे रिश्तेदार होते थे या साहूकार।
बैंकों के डूबने का लोगों की रखी धन संपत्ति का डूबने का सिलसिला इस देश में लगातार जारी है साडे 300 से ऊपर बैंक का आज तक डूब चुके हैं।
1955 में सरकार एक नियमन लेकर आए एसबीआई भारतीय स्टेट बैंक नियम इसका मकसद था कि जो भी इंडिया के इंपीरियल बैंक से उनको राष्ट्रीयकरण करना। आधुनिक बैंकिंग का लाभ ग्रामीण स्तर तक देने के लिए इस नियम का गठन हुआ था। लेकिन फिर भी काफी लंबे समय तक सिर्फ 56 शहरों तक ही बैंकिंग का अधिकतर लाभ मिल पाया। इंदिरा गांधी ने बैंकों के सरकारी करण का कार्य उच्च स्तर पर किया था और इसी वजह से भारत के सभी बैंक का राष्ट्रीयकरण हुआ और वह एक बन पाए।
इससे ग्रामीण इलाकों को अधिक से अधिक कर्ज मिले।
लेकिन अब सरकार बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को बेचना चाहती है और इसके लिए वह एक नियम लाना चाहती है सरकार को अपनी मंशा पूरी करने के लिए एक कानून लाना पड़ेगा।
पुराने नियम के अनुसार सरकार को 51% हिस्सेदारी सभी सार्वजनिक बैंकों की अपने पास रखनी होगी। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 को भी बदलना होगा।
जैसे ही यह खबर बाढ़ आई उसके बाद सभी बैंक एसोसिएशन ने हंगामा करना शुरू कर दिया वह अपने विरोध के स्वर बाहर लाने के लिए आ गया। इसी वजह से सोलर 17 दिसंबर को भारत में प्राइवेट सेक्टर के सभी बैंकों ने विरोध जताने के लिए कार्य अथवा आंशिक रूप से किया गया तो बिल्कुल नहीं किया। और हड़ताल का ऐलान कर दिया।
सरकार और यूनियन की बैठक विफल से विफलता की तरफ से जाती जा रही है।
फेडरेशन ऑफ बैंक ऑफ इंडिया ऑफीसर्स एसोसिएशन का कहना है कि हाल ही में सरकार ने बैंकों की भूरी भूरी प्रशंसा की है लेकिन उसके बावजूद जो है ऐसे नियम लाए जा रहे हैं।
उनके अनुसार सरकार की मंशा उनको बदनाम करने के लिए सरकारी बैंक अच्छा काम करते हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें