शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

ऊरध्वमूलमधः शाखमश्वत्थ- ं प्राहुरव्य- यम्‌ । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥

 ऊरध्वमूलमधः शाखमश्वत्थ- ं प्राहुरव्य- यम्‌ ।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥

Geeta chapter 15.1


गीता के 15 अध्याय के पहले श्लोक का बहुत ही गुढ रहस्य है।

प्रभु कहते हैं कि यह जो संसार रूपी वृक्ष, जो उल्टा लटका हुआ इसके मूल में सर्वशक्तिमान परमात्मा रहते हैं, और इसकी पत्तियां जो हरी पत्तियां हैं वह साक्षात वेद है यदि आपको प्रभु के पास पहुंचना है तो आपको वेदों का सहारा लेना होगा।

यहां इस वृक्ष की शाखाओं को सन सारिक प्रवृत्तियों से तुलना की गई है इस मायावी संसार रूपी वृक्ष की शाखाओं में मनुष्य उलझा रहता है और हमेशा एक शाखा से दूसरे शाखा पर जाता रहता है।

और इसी तरह जीवन व्यतीत होता रहता है।

लेकिन ठीक विपरीत इस वृक्ष की एक छाया है या प्रतिबिंब है वह प्रतिबिंब हमारा अध्यात्मिक प्रतिबिंब होता है।

अगर हमें इस उल्टे लटके हुए पेड़ की मूल में पहुंचना है और मूल के परे जाकर अध्यात्मिक प्रतिबिंब को देखना है तो हमें वेदों का सहारा लेना होगा।

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